हमारा शरीर समय का पाबंद होता है। हमारी रोजमर्रा की जीवनशैली से चलने का मतलब है कि हमारा शरीर उस निश्चित समय और वस्तु का बाध्य है। यदि जैसा रोजाना होता है, वैसा न हो तो शरीर को गड़बड़ी का एहसास होता है। बाडी क्लाक का बिगड़ना इसका ही रिज़ल्ट है। दरअसल हम सही समय पर पाबंद न हों तो इससे शरीर समझ नहीं पाता कि उसके साथ किस समय क्या होना है और उसे किस समय क्या करना है। ऐसे में वह हमेशा गड़बड़ रहता है। परिणामस्वरूप बीमारियां हमें आ दबोचती हैं। इसलिए जरूरी है कि आप हमेशा निर्धारित समय पर भी भोजन या नाश्ता करें। गलत समय पर खाना खाने या खाना न खाने से कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। बढ़ता है मोटापा अगर आप नाश्ता छोड़ते हैं और इसके बजाय किसी अन्य समय खाने को तरजीह देते हैं तो यह मोटापा बढ़ना है। दरअसल समूचे विश्व में इस बात को नोटिस किया गया है कि जो लोग नाश्ता करते हैं, वे कम मोटे होते हैं। उनका स्वास्थ्य बेहतर रहता है। इतना ही नहीं उन्हें कोई गंभीर बीमारी भी नहीं होती। दरअसल नाश्ता इसलिए सही समय पर करना जरूरी है क्योंकि इसके बात हमारा शरीर सक्रिय रहता है। हम घर से दफ्तर या कालेज पहुंचने के लिए सज...
हम सब जब बच्चे थे तब किसी ने सोचा था कि बड़ा होकर बस एक ऐवरेज लाइफ़ जियूंगा, कॉम्प्रोमाइज करूंगा, पैसों की तंगी में जीयूंगा। नहीं, हममें कुछ बड़ा बनने का, कुछ बड़ा कर दिखाने का जज़्बा था, हौसला था। हम सब आसमानों में ऊंची उड़ानें भरने वाले पंछी थे, कोई शक कोई दुख कोई निराशा नहीं थी। फिर वही बच्चा 25-30 साल का होते होते अपने आप को एक छोटे से दायरे में क्यों समेट लेता है? उसकी उड़ान कुछ हजार रुपयों की job तक कैसे सिमट जाती है, खुद पर जो विश्वास था, आगे बढ़ने का जो जज़्बा जो हौसला था वो कहां गायब हो जाता है? मैं आपको आज इसका कारण बताता हूं जिसे कोई स्कूल, कोई कॉलेज और ज्यादातर पेरेंट्स नहीं सिखाते। कारण ये है कि बचपन में "सीखने" की, अपने आप को इम्प्रूव करने की जो ललक होती है, बड़े होने पर वो गायब हो जाती है। पहाड़े, स्पेलिंग्स, सामाजिक, विज्ञान, फिर कॉलेज में लिटरेचर, अकाउंट्स, साइंस के फॉर्मूले रटने का काम शुरू होता है ताकि exam में लिखकर अच्छे मार्क्स ला सकें। ये सब चीजें लाइफ में काम आती हैं? फिर डिग्री लेने के बाद job लग जाती है और लाइफ़ का एक ढर्रा सेट हो जाता है। मेरा आपसे...
Accha ha
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